– लोकपाल ने दी मुकदमा दर्ज करने की संस्तुति
CITY NEWS FATEHPUR
फतेहपुर(CNF)। विकास खण्ड विजयीपुर के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत विजयीपुर (एकौरा) में मनरेगा योजना के नाम पर करोड़ों रुपये के बंदरबांट का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। लोकपाल मनरेगा द्वारा की गई गहन जाँच में प्रथम दृष्टया लगभग 35 लाख रुपये के गबन की पुष्टि हुई है। लोकपाल ने अपनी रिपोर्ट में दोषी ग्राम प्रधान और संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने और गबन की गई धनराशि की वसूली करने की कड़ी संस्तुति की है।
शिकायतकर्ता प्रियेन्द्र प्रताप सिंह की शिकायत पर लोकपाल राजबहादुर यादव ने तकनीकी टीम के साथ मौके पर जांच की। जांच में यह तथ्य सामने आया कि ग्राम पंचायत स्तर पर बिना कार्य कराए ही कूटरचित और फर्जी दस्तावेज तैयार कर सरकारी धन निकाल लिया गया। मस्टर रोल पर सक्षम अधिकारियों के हस्ताक्षर न होने के बावजूद कंप्यूटर ऑपरेटरों की मिलीभगत से डेटा फीडिंग कराई गई और भुगतान प्राप्त कर लिया गया। लोकपाल ने अपनी आख्या में इसे स्पष्ट रूप से सरकारी धन का अपहरण करार दिया है। जांच रिपोर्ट के बाद भी कार्रवाई न होने का फायदा उठाते हुए ग्राम प्रधान पर साक्ष्य मिटाने के गंभीर आरोप लगे हैं। शिकायतकर्ता ने साक्ष्यों के साथ अवगत कराया है कि अबरार के खेत से बबलू के खेत तक कराए गए जिस कार्य की जाँच लोकपाल ने की थी, वहां अब जेसीबी मशीन की सहायता से मिट्टी निकलवाकर उसे नया कार्य दिखाने की कोशिश की जा रही है। इस संबंध में जीपीएस युक्त फोटो भी उच्चाधिकारियों को साक्ष्य के रूप में भेजे गए हैं। लोकपाल की जाँच आख्या में विकास खण्ड स्तर से लेकर ग्राम पंचायत स्तर तक के कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, बिना विभाग की अनुमति के कार्य कराए गए और अपात्र व्यक्तियों को व्यक्तिगत लाभ पहुँचाकर सरकारी खजाने को चूना लगाया गया। लोकपाल ने दोषी ग्राम प्रधान, ग्राम पंचायत स्तरीय कर्मचारियों और विकास खण्ड के उत्तरदायी अधिकारियों के विरुद्ध मनरेगा अधिनियम की सुसंगत धाराओं के तहत दण्डात्मक और विधिक कार्यवाही की प्रबल सिफारिश की है। इस पूरे प्रकरण की जाँच रिपोर्ट 10 फरवरी को ईमेल और डाक के माध्यम से अपर आयुक्त (ग्राम्य विकास) लखनऊ, जिलाधिकारी और मुख्य विकास अधिकारी को भेजी जा चुकी है। शिकायतकर्ता प्रियेन्द्र प्रताप सिंह ने स्पष्ट किया है कि यदि लोकपाल की संस्तुति के आधार पर दोषियों के विरुद्ध तत्काल प्रशासनिक और दण्डात्मक कार्रवाई नहीं की जाती है, तो वे न्याय के लिए माननीय उच्च न्यायालय की शरण लेने को बाध्य होंगे।

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