देश के संविधान से ज्यादा शरीयत को तवज्जो देने वाले और पंद्रह साल की उम्र की लड़की के विवाह को जायज मानने की सोच रखने वालों को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने करारा झटका दिया है। अदालत ने साफ और सख्त शब्दों में कहा है कि देश में विवाह की कानूनी आयु सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होगी और किसी भी धर्म का पसर्नल लॉ उससे ऊपर नहीं हो सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम पसर्नल लॉ में यौवन प्राप्ति को विवाह की आयु मानने का प्रावधान बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम और बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम को निष्प्रभावी नहीं कर सकता। अदालत ने दो टूक कहा कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े ये कानून राष्ट्रीय नीति, सार्वजनिक स्वास्थ्य और वैज्ञानिक समझ पर आधारित हैं, इसलिए इनके सामने किसी भी व्यक्तिगत कानून का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

 

हम आपको बता दें कि न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने एक जुलाई को यह महत्वपूर्ण टिप्पणी बुलंदशहर में दर्ज एक प्राथमिकी को निरस्त करने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए की। यह याचिका रूबी समेत उन्नीस लोगों की ओर से दाखिल की गई थी। इन सभी पर आरोप है कि उन्होंने सोलह वर्ष की एक मुस्लिम किशोरी का विवाह रुकवाने पहुंची पुलिस और बाल सहायता दल पर हमला किया, सरकारी कार्य में बाधा डाली और किशोरी को जबरन वहां से ले जाने का प्रयास किया।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि मुस्लिम शरीयत कानून के अनुसार यौवन प्राप्त करने के बाद, जिसे सामान्य रूप से पंद्रह वर्ष की आयु माना जाता है, लड़की विवाह के लिए सक्षम हो जाती है। उनका कहना था कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम मुस्लिम समुदाय के व्यक्तिगत विवाह कानून को प्रभावित नहीं करता।

 

उच्च न्यायालय ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून का ऐसा प्रावधान बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम और बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम से स्पष्ट रूप से असंगत है। अदालत ने कहा कि यदि अठारह वर्ष से कम आयु के बच्चों का विवाह स्वीकार कर लिया जाए तो इससे बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम का प्रत्यक्ष उल्लंघन होगा, क्योंकि वैवाहिक संबंध स्वाभाविक रूप से शारीरिक संबंधों से जुड़े होते हैं। ऐसे में बाल विवाह को वैध मानना बच्चों की सुरक्षा के लिए बने कानून को निष्प्रभावी कर देगा।

 

खंडपीठ ने यह भी कहा कि यद्यपि इस विषय पर विभिन्न उच्च न्यायालयों की अलग अलग राय रही है, लेकिन वह केरल उच्च न्यायालय की उस व्याख्या से पूरी तरह सहमत है जिसमें कहा गया है कि कोई भी पसर्नल लॉ बाल विवाह पर रोक लगाने वाले वैधानिक कानूनों को निरस्त नहीं कर सकता।

 

मामले के तथ्यों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि किशोरी के माता पिता और समुदाय के कुछ लोगों ने कानून का उल्लंघन करते हुए उसका विवाह कराने का सुनियोजित प्रयास किया था। न्यायालय ने पुलिस और बाल सहायता दल की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने समय रहते हस्तक्षेप कर बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम के तहत संभावित अपराध को होने से रोका। अदालत ने कहा कि बचाव दल पूरी निष्ठा से अपने वैधानिक दायित्व का निर्वहन कर रहा था, लेकिन आरोपितों ने उनके साथ अभद्रता की, धमकियां दीं और सरकारी कार्य में गंभीर बाधा उत्पन्न की। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया सरकारी कर्मचारियों के कार्य में बाधा डालने समेत अन्य गंभीर अपराध बनते हैं और इनकी गहन जांच आवश्यक है। इसी आधार पर न्यायालय ने प्राथमिकी रद्द करने से इंकार करते हुए जांच जारी रखने का आदेश दिया।

 

इस फैसले के बाद विभिन्न पक्षों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता एसक्यूआर इलियास ने कहा कि मुसलमानों को देश के कानून का पालन करना चाहिए। हालांकि उन्होंने केंद्र सरकार से यह भी आग्रह किया कि समाज में किशोर किशोरियों के बीच बढ़ते शारीरिक संबंधों की प्रवृत्ति और सामाजिक नैतिकता की रक्षा के मद्देनजर विवाह की कानूनी आयु पर पुनर्विचार किया जाए।

 

वहीं मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे प्रगतिशील दिशा निर्देश बताया। संगठन की संस्थापक जाकिया सोमन ने कहा कि मुस्लिम पारिवारिक कानून का स्पष्ट संहिताकरण नहीं होने के कारण समय के साथ कई ऐसी परंपराएं विकसित हो गई हैं जो कुरआन के मूल सिद्धांतों और मूल्यों से मेल नहीं खातीं। उन्होंने विवाह, तलाक, भरण पोषण, गोद लेने और उत्तराधिकार जैसे मामलों में स्पष्ट और एक समान कानूनी व्यवस्था बनाने की मांग दोहराई।

 

सामाजिक शोध केंद्र की निदेशक और महिला शक्ति संपर्क की अध्यक्ष रंजना कुमारी ने भी फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि विभिन्न धर्मों के अनेक व्यक्तिगत कानूनों में महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण प्रावधान मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि लंबे समय से महिला अधिकार कार्यकर्ता यह मांग करते रहे हैं कि देश का समान कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।

 

बहरहाल, इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह फैसला केवल एक आपराधिक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि उसने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि बच्चों की सुरक्षा और बाल विवाह पर रोक से जुड़े कानून किसी भी धार्मिक परंपरा या व्यक्तिगत कानून से ऊपर हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि जब बात बच्चों के अधिकारों, सुरक्षा और भविष्य की हो तो देश का कानून ही सर्वोच्च होगा।

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