मोहसिन खान की रिपोर्ट
सिटी न्यूज़ फतेहपुर
भारत की अर्थव्यवस्था आज दुनिया में चर्चा का विषय है। विकास दर, विदेशी निवेश, बुनियादी ढांचे का विस्तार, डिजिटल भुगतान और उत्पादन क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियां निश्चित रूप से एक बदलते भारत की तस्वीर पेश करती हैं। सरकार इन उपलब्धियों को अपनी आर्थिक नीतियों की सफलता के रूप में प्रस्तुत कर रही है। लेकिन लोकतंत्र में किसी भी आर्थिक नीति की अंतिम कसौटी सरकारी आंकड़े नहीं, बल्कि आम नागरिक का जीवन होता है।
आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि देश की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, लेकिन क्या आम आदमी की आर्थिक ताकत भी उसी अनुपात में बढ़ रही है?
जीडीपी बढ़ना देश के लिए अच्छी खबर है। सड़कें बनना, रेलवे का विस्तार, उद्योगों में निवेश और डिजिटल अर्थव्यवस्था का मजबूत होना विकास के महत्वपूर्ण संकेतक हैं। लेकिन दूसरी तस्वीर भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती। मध्यम वर्ग अपने बढ़ते खर्च से परेशान है, छोटे कारोबारियों के सामने प्रतिस्पर्धा और लागत की चुनौती है, ग्रामीण परिवार आय और महंगाई के बीच संतुलन बनाने में जुटे हैं और युवाओं की सबसे बड़ी चिंता रोजगार है।
यहीं से अर्थव्यवस्था राजनीति का विषय बन जाती है।
सरकार के पास विकास के आंकड़े हैं तो विपक्ष के पास महंगाई और रोजगार का सवाल। सरकार कह सकती है कि भारत वैश्विक स्तर पर आर्थिक शक्ति बन रहा है, लेकिन विपक्ष पूछ सकता है कि इस आर्थिक ताकत का फायदा समाज के अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंचा? दोनों पक्षों के तर्क अपनी जगह हैं, लेकिन जनता की चिंता इससे कहीं ज्यादा सीधी है—कमाई कितनी बढ़ी और खर्च कितना बढ़ गया?
भारतीय राजनीति में आर्थिक मुद्दों की अहमियत इसलिए बढ़ रही है क्योंकि आने वाला समय युवा भारत का है। बड़ी संख्या में युवा शिक्षा पूरी करने के बाद रोजगार की तलाश में हैं। उन्हें केवल विकास के बड़े दावे नहीं, बल्कि सम्मानजनक और स्थायी रोजगार चाहिए। यदि अर्थव्यवस्था तेज गति से बढ़ती है लेकिन पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा नहीं करती, तो विकास की राजनीतिक स्वीकार्यता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
ग्रामीण भारत की स्थिति भी इसी बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसान की आय, कृषि लागत, मजदूरों की मजदूरी और गांवों में रोजगार के अवसर सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। ग्रामीण मांग मजबूत होगी तो बाजार मजबूत होगा और बाजार मजबूत होगा तो उद्योग तथा व्यापार को भी गति मिलेगी। इसलिए आर्थिक विकास की नीति में गांव और किसान को केवल चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक रणनीति का केंद्र बनाना होगा।
छोटे व्यापारी और लघु उद्योग भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। बड़े निवेश और बड़े उद्योगों की चर्चा जरूरी है, लेकिन स्थानीय बाजार में रोजगार पैदा करने वाले छोटे कारोबारों की परेशानियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। कर व्यवस्था, ऋण, बिजली, किराया, कच्चा माल और बाजार की प्रतिस्पर्धा जैसी समस्याओं का समाधान किए बिना आर्थिक विकास को व्यापक आधार देना मुश्किल होगा।
यहां विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सरकार की आलोचना लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है, लेकिन केवल महंगाई और बेरोजगारी के आंकड़े गिनाना पर्याप्त नहीं। विपक्ष को यह भी बताना होगा कि सत्ता में आने पर उसकी आर्थिक नीति क्या होगी। रोजगार कैसे पैदा होंगे, उद्योग कैसे बढ़ेंगे, किसानों की आय कैसे मजबूत होगी और कल्याणकारी योजनाओं के लिए धन कहां से आएगा—इन सवालों के ठोस जवाब जनता चाहती है।
आज भारत के सामने अवसर बड़ा है। युवा आबादी, विशाल बाजार, तकनीकी क्षमता और तेजी से विकसित होता बुनियादी ढांचा देश को नई आर्थिक ऊंचाइयों तक ले जा सकता है। लेकिन इसके साथ सामाजिक और आर्थिक असमानता को कम करना भी जरूरी है।
विकास का असली अर्थ तब होगा, जब उसकी चमक महानगरों से निकलकर कस्बों, गांवों और आम परिवारों की जिंदगी में दिखाई दे।
भारत की अर्थव्यवस्था को केवल दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में स्थान बनाने की दौड़ में नहीं देखा जाना चाहिए। असली लक्ष्य ऐसा भारत होना चाहिए जहां युवा को रोजगार मिले, किसान को अपनी मेहनत का उचित मूल्य मिले, व्यापारी को सुरक्षित माहौल मिले और आम परिवार महंगाई के दबाव में अपनी जरूरतों से समझौता करने को मजबूर न हो।
सरकार के लिए आर्थिक विकास राजनीतिक उपलब्धि तभी बनेगा जब उसका लाभ जनता महसूस करेगी। विपक्ष के लिए यह मुद्दा तभी प्रभावी होगा जब वह आलोचना के साथ विश्वसनीय विकल्प भी प्रस्तुत करेगा।
आखिरकार लोकतंत्र में जनता आंकड़ों से प्रभावित जरूर होती है, लेकिन अपनी रसोई, रोजगार और भविष्य से फैसला करती है।
