आज मोबाइल फोन हमारी जिंदगी का जरूरी हिस्सा बन चुका है। संचार से लेकर शिक्षा, बैंकिंग और मनोरंजन तक लगभग हर काम मोबाइल के जरिए होने लगा है। तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही गंभीर है। सबसे अधिक चिंता बच्चों को लेकर है, जिनका बचपन धीरे-धीरे मोबाइल स्क्रीन की गिरफ्त में आता जा रहा है।

कुछ वर्ष पहले तक बच्चे मैदानों में खेलते, दोस्तों के साथ समय बिताते और शाम होते ही घर लौटते थे। आज स्थिति बदल गई है। खेल के मैदान की जगह मोबाइल गेम ने ले ली है और दोस्तों के साथ बातचीत की जगह वीडियो देखने की आदत बढ़ती जा रही है। कई बच्चे भोजन करते समय, पढ़ाई के बीच और यहां तक कि सोने से पहले भी मोबाइल से चिपके रहते हैं।

यह केवल समय की बर्बादी का विषय नहीं है। लगातार स्क्रीन देखने की आदत बच्चों की एकाग्रता, नींद, शारीरिक गतिविधि और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि कई अभिभावक बच्चे को व्यस्त रखने के आसान साधन के रूप में मोबाइल दे देते हैं। शुरुआत में यह सुविधा लगती है, लेकिन धीरे-धीरे आदत निर्भरता में बदल सकती है।

यह भी सच है कि मोबाइल और इंटरनेट बच्चों के लिए पूरी तरह नुकसानदेह नहीं हैं। सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो ऑनलाइन माध्यम शिक्षा, ज्ञान और रचनात्मकता के शानदार अवसर उपलब्ध कराते हैं। समस्या तकनीक में नहीं, बल्कि उसके अनियंत्रित इस्तेमाल में है।

इसलिए जिम्मेदारी केवल बच्चों की नहीं, अभिभावकों की भी है। घर में मोबाइल इस्तेमाल के स्पष्ट नियम होने चाहिए। बच्चों के साथ बातचीत, खेलकूद और परिवार के साथ समय बिताने को प्राथमिकता देनी होगी। माता-पिता स्वयं हर समय फोन में व्यस्त रहेंगे तो बच्चों से मोबाइल कम इस्तेमाल करने की उम्मीद करना भी व्यावहारिक नहीं होगा।

विद्यालयों को भी इस दिशा में जागरूकता बढ़ानी चाहिए। बच्चों को केवल मोबाइल से दूर रहने की सलाह देने के बजाय उन्हें खेल, पुस्तक पढ़ने, कला, संगीत और अन्य रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ना होगा। गांव और शहर दोनों जगह सुरक्षित खेल मैदान और सार्वजनिक पुस्तकालय जैसी सुविधाओं को बढ़ावा देना भी समय की मांग है।

बचपन जीवन का वह दौर है जिसे दोबारा हासिल नहीं किया जा सकता। यदि इस उम्र में बच्चे प्रकृति, खेल, किताब और रिश्तों की जगह केवल स्क्रीन की दुनिया में सिमट गए तो इसका असर आने वाले वर्षों में समाज पर भी दिखाई देगा।

तकनीक से भागना समाधान नहीं है, लेकिन तकनीक को जीवन पर हावी होने देना भी समझदारी नहीं। हमें बच्चों को मोबाइल का गुलाम नहीं, बल्कि तकनीक का समझदार उपयोगकर्ता बनाना होगा। बच्चों के हाथ में मोबाइल से पहले किताब, खेल का सामान और परिवार का समय होना चाहिए। यही स्वस्थ और संतुलित बचपन की असली पहचान है।

मेराज उद्दीन महताब
संपादक
सिटी न्यूज फतेहपुर

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