क्या इतिहास कभी-कभी अजीब तरीके से खुद को दोहराता है? 1975 में जब देश में आपातकाल लागू हुआ, तब 26 जून की सुबह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी के जरिए देश को इसकी आधिकारिक जानकारी दी थी। दिल्ली के कई अखबारों के दफ्तरों की बिजली पिछली रात ही काट दी गई थी और प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई थी। यानी उस दौर में देश को आपातकाल की खबर आकाशवाणी से मिली थी।

और अब 51 साल बाद तस्वीर बिल्कुल अलग है, लेकिन जगह फिर आकाशवाणी भवन है। मंगलवार को निर्वाचन आयोग के खिलाफ मार्च करते हुए राहुल गांधी और प्रियंका गांधी उस समय आकाशवाणी भवन परिसर में पहुंच गए, जब पुलिस ने INDIA गठबंधन के सांसदों को निर्वाचन सदन की ओर बढ़ने से रोक दिया। क्या यह महज संयोग है या राजनीति का प्रतीकात्मक संदेश?

सवाल इसलिए भी बड़ा है कि राहुल गांधी जिस मुद्दे को लेकर सड़क पर हैं, उस पर देश की सर्वोच्च अदालत में सुनवाई चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को Form-6 में हुए कथित बदलावों से जुड़े मामले में केंद्र और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया और रिकॉर्ड पेश करने को कहा है। अदालत ने साफ किया कि उसने Form-6 के किसी संशोधित प्रारूप को मंजूरी नहीं दी थी और वह यह देखेगी कि बदलाव किसने किए।

तो फिर सवाल उठता है कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने विचाराधीन है, जब निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा जा चुका है, तो क्या संसद से सड़क तक राजनीतिक दबाव बनाना जरूरी है?

सवाल उठता है कि क्या लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाने का अधिकार राजनीतिक दलों को नहीं है? बिल्कुल है। लेकिन क्या विरोध और संस्थागत प्रक्रिया के बीच कोई मर्यादा नहीं होनी चाहिए? क्या किसी संवैधानिक संस्था के खिलाफ लगातार सड़क पर आंदोलन खड़ा करना उसके प्रति जनता के भरोसे को प्रभावित नहीं कर सकता?

हम आपको बता दें कि आज विपक्षी सांसद संसद से निर्वाचन आयोग की ओर बढ़े। पुलिस ने उन्हें रास्ते में रोक दिया। कई सांसदों को हिरासत में लेकर बसों में बैठाया गया। इसके बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी आकाशवाणी भवन के परिसर में पहुंच गए और वहां धरना शुरू कर दिया। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि लोकतंत्र के साथ अन्याय हो रहा है और निर्वाचन आयोग को विपक्षी सांसदों से मिलना चाहिए। लेकिन यहां एक और सवाल है कि क्या किसी संवैधानिक संस्था तक पहुंचने के लिए निर्धारित रास्ता छोड़कर दूसरे सरकारी परिसर में प्रवेश करना लोकतांत्रिक विरोध की उचित सीमा में आता है?

क्या सड़क को घंटों राजनीतिक विरोध का मंच बना देना आम नागरिकों की सुविधा और कानून-व्यवस्था के सवाल से अलग करके देखा जा सकता है? या फिर राजनीतिक संघर्ष का यही तरीका अब भारतीय लोकतंत्र की नई सामान्य तस्वीर बनने जा रहा है?

यहां यह भी गौर करने वाली बात है कि जिस मुद्दे पर कांग्रेस और INDIA गठबंधन सड़क पर हैं, उसी मुद्दे को लेकर Cockroach Janta Party यानी CJP ने भी 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया है। CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर इस प्रदर्शन की घोषणा की है। यहां सवाल यह उठता है कि क्या राहुल गांधी के लिए यह एक नई राजनीतिक चुनौती है? क्या 10 अक्टूबर के प्रस्तावित CJP प्रदर्शन से पहले कांग्रेस अपने आंदोलन को राजनीतिक रूप से अधिक धार देना चाहती है? सवाल यह भी है कि क्या कांग्रेस को ऐसा भय लग रहा है कि सीजेपी विपक्ष में उसकी जगह लेती जा रही है?

देखा जाये तो यह सारा दृश्य विचित्र इसलिए है क्योंकि एक तरफ कांग्रेस संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और मताधिकार की रक्षा की बात कर रही है, तो दूसरी तरफ उसी संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा न्यायपालिका इस पूरे विवाद की जांच कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है; उसने जवाब और रिकॉर्ड मांगे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फैसला अदालत को करने दिया जाना चाहिए? क्या राजनीतिक दलों को न्यायिक प्रक्रिया के समानांतर सड़क पर फैसला सुनाने से बचना चाहिए? क्या निर्वाचन आयोग पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है या लगातार आरोपों के जरिए उसकी संस्थागत विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचने का खतरा भी है? क्या यह लड़ाई वास्तव में वोटर लिस्ट की है, या इसके पीछे 2026 की राजनीति में संवैधानिक संस्थाओं को लेकर एक बड़ा राजनीतिक संघर्ष आकार ले रहा है?

बहरहाल, आकाशवाणी भवन में राहुल गांधी का धरना उस बहस को फिर सामने लाता है कि लोकतंत्र में संस्थाओं की जवाबदेही और उनकी गरिमा के बीच संतुलन आखिर कैसे कायम रखा जाए। आने वाले दिनों में कांग्रेस, निर्वाचन आयोग, सुप्रीम कोर्ट तथा 10 अक्टूबर के CJP प्रदर्शन के घटनाक्रम से इस राजनीतिक टकराव की दिशा और स्पष्ट हो सकती है।

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