कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर पुनः प्रतिबंध लगाने की मांग ने एक बार फिर देश के राजनीतिक विमर्श को गरमा दिया है। सरदार पटेल की जयंती के अवसर पर खरगे ने कहा कि ‘‘देश में कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं के लिए संघ जिम्मेदार है’’ और ‘‘सरदार पटेल की विरासत का सम्मान तभी होगा जब संघ पर दोबारा प्रतिबंध लगे’’। देखा जाये तो यह बयान केवल राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस विचारधारा पर प्रहार है जिसने एक सदी से राष्ट्रनिर्माण की दिशा में कार्य किया है।

संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने खरगे की इस मांग पर सटीक प्रतिक्रिया देते हुए पूछा— “किस आधार पर प्रतिबंध लगाया जाएगा? क्या राष्ट्रनिर्माण में लगे संगठन को निशाना बनाना उचित है? जनता पहले ही संघ को स्वीकार कर चुकी है।”

देखा जाये तो खरगे या उनके पुत्र या अन्य कांग्रेस नेता आरएसएस के बारे में भले ही कितना दुष्प्रचार करें लेकिन सच तो यह है कि 1925 में अपनी स्थापना के बाद से आरएसएस ने सामाजिक एकता, सेवा और राष्ट्रीय चरित्र निर्माण के क्षेत्र में जो कार्य किए हैं, वे किसी एक दल की नहीं बल्कि पूरे समाज की धरोहर हैं।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1962 के चीन युद्ध तक और 1947 के विभाजन के दौरान राहत कार्यों से लेकर आज के सेवा प्रकल्पों तक, संघ ने राष्ट्र के हर संकटकाल के दौरान सेवा कार्यों में अग्रणी भूमिका निभाई है। महात्मा गांधी ने वर्धा में संघ शिविर का निरीक्षण करते हुए कहा था कि “यहां अनुशासन और अस्पृश्यता की अनुपस्थिति देखकर मैं चकित हूं।” डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी संघ में जातिभेदरहित वातावरण की प्रशंसा की थी। 1963 में पंडित नेहरू ने स्वयं संघ को स्वतंत्रता दिवस परेड में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया था। ये तथ्य बताते हैं कि संघ केवल एक संगठन नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक ताने-बाने में गहराई से रचा-बसा आंदोलन है।

इसके अलावा, खरगे का यह बयान कांग्रेस की वैचारिक असुरक्षा का प्रतीक प्रतीत होता है। आज जबकि संघ का प्रभाव केवल भाजपा तक सीमित नहीं रहा, वह समाज के हर वर्ग, हर क्षेत्र में सेवा कार्यों के माध्यम से उपस्थित है, ऐसे समय में प्रतिबंध की मांग जनता की भावनाओं से टकराने वाली बात है। यह वही जनता है जो बाढ़, भूकंप या महामारी के समय ‘संघ के स्वयंसेवकों’ को बिना प्रचार-प्रसार के राहत कार्य करते देखती है। जिस संगठन की जड़ें समाज में इतनी गहरी हों, उस पर प्रतिबंध लगाने की बात कहना वस्तुतः उस समाज की नब्ज़ को न समझने के समान है।

वैसे यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस ने संघ को निशाना बनाया हो। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर अस्थायी प्रतिबंध लगाया था, परंतु न्यायिक जांच और कपूर आयोग की रिपोर्ट में संघ को निर्दोष पाया गया। प्रतिबंध हटा और संघ पहले से अधिक मजबूत होकर उभरा। इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी वैचारिक आंदोलन को दमन से दबाने की कोशिश हुई, वह और तीव्र गति से समाज में फैला। आज की कांग्रेस शायद इस इतिहास से सबक लेने को तैयार नहीं है।

संघ पर प्रतिबंध की बात न केवल राजनीतिक रूप से अलोकप्रिय है बल्कि सामाजिक रूप से भी विभाजनकारी असर डाल सकती है। इससे करोड़ों स्वयंसेवकों और समर्थकों में असंतोष पनपेगा, जो इसे अपनी सेवा भावना और देशभक्ति पर प्रश्नचिह्न के रूप में देखेंगे। जनता के एक बड़े वर्ग के लिए संघ अब किसी राजनीतिक दल का परिशिष्ट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतीक है। ऐसे संगठन पर प्रतिबंध की बात करके कांग्रेस स्वयं को जनता से और दूर धकेल सकती है।

बहरहाल, मल्लिकार्जुन खरगे का वक्तव्य कांग्रेस की उस वैचारिक थकान को उजागर करता है जो अब केवल विरोध के लिए विरोध की राजनीति कर रही है। देश को जोड़ने वाले संगठन को बांटने की कोशिश न केवल राजनीतिक भूल है, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता के प्रति असंवेदनशीलता भी है। संघ पर प्रतिबंध की मांग दरअसल उस समाज की भावना को चुनौती देना है जिसने वर्षों की साधना से इस संगठन को अपनाया है और जब जनता स्वयं किसी विचार को स्वीकार कर चुकी हो, तब कोई भी प्रतिबंध केवल कागजों पर रह जाता है।

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