सुप्रीम कोर्ट ने एक ट्रायल कोर्ट के आदेश पर गंभीर आपत्ति जताई है, जिसमें कथित तौर पर एआई की मदद से तैयार किए गए ऐसे केस लॉ का हवाला दिया गया था जो आधिकारिक अभिलेखों में मौजूद ही नहीं थे। अदालत ने इसे न्यायिक आचरण के खिलाफ बताते हुए सख्त टिप्पणी की है।

मामला तब सामने आया जब संबंधित फैसले में जिन पूर्व नजीरों का उल्लेख किया गया था, वे आधिकारिक कानूनी डेटाबेस और रिकॉर्ड में नहीं मिले। मौजूद जानकारी के अनुसार प्रारंभिक जांच में संकेत मिला कि ये कथित निर्णय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स के जरिए तैयार किए गए थे और उन्हें वास्तविक न्यायिक मिसाल मान लिया गया।

 

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गैर-मौजूद फैसलों का हवाला देना न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को कमजोर करता है और आम जनता के विश्वास को चोट पहुंचाता है। पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी भी न्यायाधीश का कर्तव्य है कि वह आदेश पारित करने से पहले उद्धृत कानूनी प्राधिकरणों का स्वतंत्र रूप से सत्यापन करे।

 

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि तकनीक, विशेषकर एआई आधारित शोध उपकरण, कानूनी अनुसंधान में सहायक हो सकते हैं। हालांकि, उन्हें अंतिम सत्य मान लेना और बिना जांचे-परखे आदेश में शामिल करना गंभीर पेशेवर चूक की श्रेणी में आता है। बता दें कि हाल के वर्षों में न्यायिक और कानूनी क्षेत्र में डिजिटल टूल्स का उपयोग तेजी से बढ़ा है, लेकिन उनके उपयोग के साथ सावधानी और जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी मानी जाती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Call Now