मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच हालात एक बार फिर नाजुक मोड़ पर नजर आ रहे हैं। ताजा घटनाक्रम में ईरान ने पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका को संशोधित शांति प्रस्ताव भेजा है, जिससे बातचीत की संभावना फिर से जगी है। बता दें कि इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेहरान के पुराने प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।
मौजूद जानकारी के अनुसार अमेरिका ने ईरान पर नौसैनिक नाकेबंदी बनाए रखी है, जिससे उसके तेल निर्यात पर बड़ा असर पड़ा है। ट्रंप का कहना है कि इस दबाव से ईरान को बातचीत की मेज पर वापस आने के लिए मजबूर किया जा सकता है। गौरतलब है कि इसी बीच अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने संभावित नए हमलों को लेकर भी राष्ट्रपति को जानकारी दी है, जिससे संघर्ष दोबारा बढ़ने की आशंका बनी हुई है।
दूसरी ओर ईरान के अंदर भी राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। खबरें हैं कि देश के विदेश मंत्री अब्बास अराघची को उनके पद से हटाने की मांग उठ रही है। आरोप है कि उन्होंने परमाणु वार्ता के दौरान राष्ट्रपति को पूरी जानकारी दिए बिना सैन्य नेतृत्व के निर्देशों का पालन किया। इस मुद्दे पर राष्ट्रपति मसू्द पेज़ेश्कियन और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबाफ ने नाराजगी जताई है।
गौरतलब है कि 8 अप्रैल से दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम लागू है, लेकिन यह काफी नाजुक स्थिति में है। अमेरिका की ओर से संभावित सैन्य कार्रवाई और ईरान की चेतावनियों ने स्थिति को और तनावपूर्ण बना दिया है। ईरान ने साफ कहा है कि अगर उस पर दोबारा हमला हुआ तो वह लंबा और कड़ा जवाब देगा।
इस पूरे घटनाक्रम का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिख रहा है। बता दें कि होरमुज जलडमरूमध्य, जो दुनिया के तेल और गैस आपूर्ति का अहम मार्ग है, वहां तनाव के कारण तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस मार्ग से करीब 20 प्रतिशत वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होती है।
अमेरिका की सैन्य मौजूदगी भी क्षेत्र में बनी हुई है। एक विमानवाहक पोत की वापसी के बावजूद करीब 20 नौसैनिक जहाज अब भी तैनात हैं, जो इस बात का संकेत है कि वॉशिंगटन फिलहाल पीछे हटने के मूड में नहीं है।
वहीं पाकिस्तान की भूमिका इस मामले में मध्यस्थ के रूप में अहम बनती जा रही है। सूत्रों के अनुसार नए प्रस्ताव के जरिए दोनों देशों के बीच गतिरोध को खत्म करने की कोशिश की जा रही है, हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि वाशिंगटन ने इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाया है।
जानकारों का मानना है कि अगर बातचीत सफल होती है तो यह क्षेत्र में स्थिरता ला सकती है, लेकिन अगर सैन्य टकराव फिर शुरू हुआ तो इसका असर सिर्फ मध्य पूर्व ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर पड़ेगा। ऐसे में आने वाले कुछ दिन इस संघर्ष के भविष्य को तय करने में बेहद अहम साबित हो सकते हैं।
