जम्मू में स्थित जम्मू विश्वविद्यालय इन दिनों अपने राजनीति विज्ञान के परास्नातक पाठ्यक्रम को लेकर चर्चा के केंद्र में है। विश्वविद्यालय की विभागीय मामलों की समिति ने एक महत्वपूर्ण सिफारिश करते हुए पाकिस्तान के गवर्नर जनरल रहे मोहम्मद अली जिन्ना, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद खान और प्रसिद्ध कवि दार्शनिक मोहम्मद इकबाल से जुड़े विषयों को पाठ्यक्रम से हटाने का प्रस्ताव दिया है। यह फैसला ऐसे समय में सामने आया है जब इस मुद्दे को लेकर छात्र संगठनों के विरोध ने जोर पकड़ लिया था।

 

इस विरोध को लेकर परिषद के जम्मू कश्मीर इकाई के सचिव सन्नक श्रीवत्स के नेतृत्व में प्रदर्शन भी किए गए। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यदि पाठ्यक्रम में तत्काल बदलाव नहीं किया गया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। साथ ही उन्होंने यह भी मांग रखी कि पाठ्यक्रम में ऐसे व्यक्तित्वों को शामिल किया जाए जिन्होंने अल्पसंख्यकों के कल्याण और राष्ट्र निर्माण में सकारात्मक योगदान दिया हो।

 

दूसरी ओर, राजनीति विज्ञान विभाग ने इस पाठ्यक्रम का बचाव भी किया था। विभागाध्यक्ष प्रोफेसर बलजीत सिंह मान का कहना था कि यह पाठ्यक्रम छात्रों को आधुनिक भारतीय राजनीतिक विचारों की व्यापक समझ देने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें विनायक दामोदर सावरकर, माधव सदाशिव गोलवलकर, महात्मा गांधी, भीमराव अंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे प्रमुख विचारकों के साथ-साथ जिन्ना, सर सैयद और इकबाल को भी शामिल किया गया था ताकि छात्र विभिन्न दृष्टिकोणों को समझ सकें।

हालांकि विरोध के बढ़ते दबाव के बीच विभागीय मामलों की समिति ने सर्वसम्मति से इन विषयों को हटाने की सिफारिश कर दी। यह सिफारिश एक वर्ष और दो वर्ष दोनों प्रकार के परास्नातक पाठ्यक्रमों पर लागू होगी। समिति ने अपने निर्णय में परिषद द्वारा उठाए गए मुद्दों को गंभीरता से लिया और माना कि इस विषय पर व्यापक सहमति जरूरी है।

 

अब यह प्रस्ताव अध्ययन मंडल के पास भेजा गया है, जिसकी बैठक चौबीस मार्च को ऑनलाइन माध्यम से होने वाली है। इस बैठक में अंतिम निर्णय लिया जाएगा कि इन विषयों को पाठ्यक्रम से हटाया जाए या नहीं। यदि अध्ययन मंडल इस सिफारिश को मंजूरी देता है तो आगामी सत्र से नया पाठ्यक्रम लागू हो सकता है। इस पूरे घटनाक्रम ने शिक्षा जगत में एक बड़ी बहस को जन्म दिया है। एक पक्ष का मानना है कि इतिहास और राजनीति के अध्ययन में सभी विचारधाराओं और व्यक्तित्वों को शामिल करना जरूरी है ताकि छात्र समग्र दृष्टिकोण विकसित कर सकें। वहीं दूसरा पक्ष यह तर्क देता है कि ऐसे व्यक्तित्वों को प्रमुखता देना जिनकी विचारधारा विवादित रही है, छात्रों के मन में भ्रम पैदा कर सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि पाठ्यक्रम निर्माण एक संतुलित प्रक्रिया होनी चाहिए, जिसमें न तो किसी विचारधारा को पूरी तरह नजरअंदाज किया जाए और न ही किसी एक पक्ष को अत्यधिक महत्व दिया जाए। यह भी जरूरी है कि छात्रों को आलोचनात्मक सोच विकसित करने का अवसर मिले ताकि वे स्वयं तथ्यों का विश्लेषण कर सकें। फिलहाल जम्मू विश्वविद्यालय का यह निर्णय आने वाले समय में अन्य शैक्षणिक संस्थानों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अध्ययन मंडल इस मुद्दे पर क्या अंतिम फैसला लेता है और इसका छात्रों तथा शिक्षा प्रणाली पर क्या प्रभाव पड़ता है।