अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। भारत में भी इस पर बहस छिड़ी हुई है और विपक्ष केंद्र सरकार से औपचारिक बयान की मांग कर रहा है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने अब तक सीधे तौर पर न तो निंदा की है और न ही शोक व्यक्त किया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने एक संयुक्त प्रेस वार्ता के दौरान कहा कि पश्चिम एशिया की स्थिति चिंताजनक है और भारत शांति व स्थिरता के पक्ष में है। उन्होंने दोहराया कि भारत का हमेशा से मानना रहा है कि ऐसे विवादों का समाधान संवाद और कूटनीति से होना चाहिए। गौरतलब है कि यह रुख भारत की पारंपरिक विदेश नीति के अनुरूप है, जो सार्वजनिक बयानबाजी से अधिक संतुलित प्रतिक्रिया को प्राथमिकता देती है।

 

मौजूद जानकारी के अनुसार अधिकांश जी7 लोकतांत्रिक देशों ने भी खामेनेई की मौत पर औपचारिक संवेदना व्यक्त नहीं की। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कड़े बयान दिए, जबकि यूरोपीय संघ और अन्य पश्चिमी देशों ने इसे क्षेत्रीय परिदृश्य का अहम मोड़ बताया, लेकिन शोक संदेश जारी नहीं किया।

 

मध्य पूर्व के कई खाड़ी देश, जहां बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं, या तो चुप रहे या स्थिति पर आपात बैठकें करते नजर आए। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि भारत के करीब 90 लाख नागरिक खाड़ी देशों में कार्यरत हैं, ऐसे में नई दिल्ली के लिए संतुलित रुख अपनाना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

 

सरकारी सूत्रों का कहना है कि खामेनेई के कार्यकाल के दौरान भारत-ईरान संबंधों में कई बार तनाव भी देखने को मिला। कश्मीर, नागरिकता संशोधन कानून और अन्य आंतरिक मुद्दों पर तेहरान की सार्वजनिक टिप्पणियों पर भारत ने आपत्ति जताई थी। ऐसे में वर्तमान घटनाक्रम को केवल भावनात्मक नजरिए से नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय हितों के संदर्भ में देखा जा रहा है।

 

बता दें कि अतीत में भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत ने अपने रणनीतिक हितों को प्राथमिकता दी है, चाहे वह परमाणु मुद्दों पर मतदान हो या ऊर्जा आयात से जुड़े फैसले। ईरान से तेल आयात में कटौती और वैकल्पिक स्रोतों की तलाश भी इसी नीति का हिस्सा रही है।

 

विश्लेषकों का मानना है कि भारत की चुप्पी दरअसल कूटनीतिक संतुलन की रणनीति है। एक ओर वह क्षेत्रीय शांति की अपील कर रहा है, दूसरी ओर किसी पक्ष के समर्थन या विरोध में खुलकर बयान देने से बच रहा है। यह रुख उन वैश्विक लोकतंत्रों के समान है जिन्होंने भी औपचारिक शोक संदेश जारी नहीं किया।

 

भारत ने इस संवेदनशील मुद्दे पर संयमित और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया है। सरकार का संकेत साफ है कि राष्ट्रीय हित, क्षेत्रीय स्थिरता और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा सर्वोपरि हैं और इसी आधार पर आगे की कूटनीतिक रणनीति तय की जाएगी हैं।

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