पश्चिम एशिया में आज घटनाक्रम ने अचानक भीषण रूप ले लिया, जब अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़े पैमाने पर युद्धक कार्रवाई की पुष्टि करते हुए इसे अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम बताया और कहा कि तेहरान को परमाणु हथियार क्षमता हासिल करने से रोकना अनिवार्य है।
हम आपको बता दें कि हमलों की पहली लहर में तेहरान के कई महत्वपूर्ण स्थलों पर विस्फोट हुए। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के परिसर तथा राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के ठिकानों को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आईं। हालांकि कुछ सूत्रों के अनुसार खामेनेई को पहले ही सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया गया था। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड के कई वरिष्ठ कमांडरों के मारे जाने की अपुष्ट खबरें भी आईं।
भारत की एक और बड़ी चिंता क्षेत्र में बसे लाखों भारतीय नागरिकों की सुरक्षा है। खाड़ी देशों में बड़ी भारतीय प्रवासी आबादी कार्यरत है। हवाई क्षेत्र बंद होने से उड़ानों पर असर पड़ा है। इंडिगो और एअर इंडिया एक्सप्रेस जैसी विमानन कंपनियों ने पश्चिम एशिया की उड़ानें अस्थायी रूप से स्थगित कर दी हैं। इजराइल का हवाई क्षेत्र बंद होने से दिल्ली तेल अवीव उड़ान को वापस लौटना पड़ा। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो निकासी अभियान चलाना पड़ सकता है।
सामरिक दृष्टि से यह टकराव अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि अमेरिकी और इजराइली हमलों का उद्देश्य केवल परमाणु कार्यक्रम को रोकना न होकर शासन परिवर्तन की दिशा में है, तो यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल सकता है। ईरान लंबे समय से लेबनान, सीरिया, इराक और यमन में अपने प्रभाव के जरिए शक्ति संतुलन बनाए हुए है। अब यदि वह सीधे अमेरिकी ठिकानों पर हमले कर रहा है तो यह छाया युद्ध से खुली जंग की ओर बढ़ने का संकेत है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिन देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं, यदि वे भी प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में शामिल हो जाएं तो क्या यह विश्व युद्ध जैसी स्थिति बन सकती है? खाड़ी के देश अब तक संतुलन साधने की कोशिश करते रहे हैं, परंतु यदि उनकी भूमि पर हमले जारी रहते हैं और वे सामूहिक प्रतिकार करते हैं, तो संघर्ष का दायरा तेजी से फैल सकता है। अमेरिका के साथ रक्षा समझौतों के कारण नाटो सहयोगी भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो सकते हैं। वहीं रूस ने हमलों की निंदा करते हुए इसे सशस्त्र आक्रमण बताया है। इस तरह यदि प्रमुख शक्तियां अलग अलग पक्षों में खुलकर उतरती हैं तो बहुध्रुवीय टकराव की आशंका बढ़ सकती है।
हालांकि तत्काल इसे विश्व युद्ध कहना जल्दबाजी होगी, परंतु ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय गठबंधनों पर पड़ने वाला प्रभाव इसे वैश्विक संकट अवश्य बना सकता है। यदि कूटनीतिक प्रयास विफल रहते हैं और होर्मुज या बाब अल मंदेब जैसे मार्ग अवरुद्ध होते हैं, तो एशिया, यूरोप और अमेरिका सभी प्रभावित होंगे। देखा जाये तो इस समय भारत के सामने संतुलित कूटनीति, ऊर्जा आपूर्ति का विविधीकरण, सामरिक भंडार का उपयोग और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सबसे बड़ी प्राथमिकताएं हैं। पश्चिम एशिया की यह ज्वाला यदि फैलती है तो इसका धुआं पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा।
