संसद में पेश की गई आर्थिक समीक्षा ने भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र के निवेश व्यवहार को लेकर एक चिंताजनक पैटर्न उजागर किया है। समीक्षा के अनुसार, भारतीय कंपनियों का झुकाव अचल संपत्तियों, विशेष रूप से रियल एस्टेट की ओर अधिक बढ़ गया है। हालांकि, जब बात लंबी अवधि के उच्च-जोखिम वाले निवेश (जैसे नई तकनीक और विनिर्माण) की आती है, तो कॉरपोरेट जगत अब भी सावधानी बरत रहा है।
साथ ही भारतीय कंपनियों में लंबी अवधि के जोखिम उठाने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने की इच्छाशक्ति की कमी देखी गई है। लोकसभा में बृहस्पतिवार को पेश की गई बजट-पूर्व समीक्षा में कहा गया कि तेजी से संरचनात्मक बदलावों से गुजर रहे समाज में, निजी क्षेत्र की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने व्यावसायिक लाभ के साथ राष्ट्र-निर्माण में कितना योगदान देता है।
दुनिया के विभिन्न हिस्सों के ऐतिहासिक उदाहरणों का हवाला देते हुए समीक्षा में कहा गया कि व्यापारिक नेताओं और कंपनियों ने केवल लाभ कमाने वाली इकाइयों के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय परियोजनाओं में संस्थागत भागीदारों के रूप में काम किया है। भारतीय निजी क्षेत्र को भी सामाजिक विश्वास और संस्थागत साख बनाने पर जोर देना होगा। समीक्षा के अनुसार, भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र एक ऐसे ‘मिश्रित क्षेत्र’ में काम करता है, जहां नियम और प्रवर्तन असमान हैं और बाजार अनुशासन की जगह अक्सर राजनीतिक मध्यस्थता ले लेती है।
