ईरान और अमेरिका के बीच अंततः जंगबंदी होने जा रही है। जिसके दस्तावेजों पर अंतिम मुहर लगनी बाकी है। इस जंग में ईरान ने जितनी ताकत से अमेरिका और इजराइल का अकेले मुकाबला किया उसने दुनिया को हैरान कर दिया। वैश्विक ऊर्जा गलियारे के गले पर हाथ रखकर जहां ईरान ने कई देशों में तेल और ऊर्जा संकट खड़ा कर दिया तो वहीं अमेरिका के कई अत्याधुनिक विमानों के भी परखच्चे उड़ा दिए। ईरान की ताकत को आज दुनिया नजरअंदाज नहीं कर सकती और वो यूरोपीय देश जो कभी अमेरिका के पिचलग्गू बने होते थे आज इस जंग को जल्द से जल्द खत्म करवाने पर तुले हैं और इसके लिए लाख जतन कर रहे हैं। इसी बीच फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और इटली ने इस समझौते का खुलकर स्वागत करते हुए इसे पश्चिमी एशिया में शांति और स्थिरता के दिशा में एक बड़ी राजनीतिक सफलता बताया है।
चारों यूरोपीय देशों के नेताओं ने संयुक्त बयान जारी कर समझौते को शीघ्र और व्यापक रूप से लागू करने का आह्वान किया है। साथ ही उन्होंने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में अमेरिका, ईरान और मध्यस्थ देशों, पाकिस्तान तथा क़तर की भूमिका की सराहना की। संयुक्त बयान में कहा गया हम अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के ज्ञापन की घोषणा का हार्दिक स्वागत करते हैं। हम इस राजनीतिक सफलता के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका, ईरानी सरकार और पाकिस्तान, कतर तथा अन्य सभी मध्यस्थों सहित सभी संबंधित पक्षों को बधाई देते हैं। यूरोपियन नेताओं ने इस समझौते को केवल दो पक्षों के बीच तनाव कम करने वाला कदम नहीं बल्कि पूरे पश्चिम एशिया में स्थिरता बहाल करने का अवसर बताया। उनका मानना है कि लंबे समय से जारी तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर पड़ रहा था। ऐसे में यह समझौता दुनिया भर के कई देशों के लिए राहत लेकर आ सकता है। चारों देशों ने इस बात पर जोर दिया कि अब सबसे महत्वपूर्ण काम समझौते के विस्तृत स्वरूप को अंतिम रूप देना और उसे पूरी तरह से लागू करना है। उन्होंने कहा कि सभी पक्षों को राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाते हुए वार्ता को तेजी से आगे बढ़ाना चाहिए।
अब यह अत्यंत आवश्यक है कि विस्तृत वार्ता संपन्न हो और इस समझौते को शीघ्रता पूर्वक और व्यापक रूप से लागू किया जाए। हम इस प्रयास में सहयोग देने के लिए तैयार हैं। समझौते का सबसे बड़ा असर होर्म जलडम्रू मध्य पर पड़ सकता है जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। वैश्विक स्तर पर समुद्र के रास्ते होने वाले तेज व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। तनाव बढ़ने के कारण इस मार्ग पर जहाज रानी प्रभावित हो गई थी और अब यूरोपीय देशों ने बिना शर्त और अप्रतिबंधित नववाहन की स्वतंत्रता के साथ होमस जलडमरू मध्य को तत्काल खोलने की मांग की है।
फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और इटली ने यह भी कहा कि वे समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने में योगदान देने के लिए तैयार हैं। इसके तहत वे वाणिज्यिक जहाजों को भरोसा दिलाने और जरूरत पड़ने पर अपने-अपने संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार बारूदी सुरंगों को हटाने जैसी पूरी तरह से रक्षात्मक और स्वतंत्र मिशन में भी भाग ले सकते हैं। अगर यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर दिखाई दे सकता है। ईरान से जुड़े होने, तनाव कम होने और समुद्री मार्ग सुरक्षित होने से कच्चे तेल की आपूर्ति सामान्य हो सकती है। जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों पर दबाव घट सकता है। इससे भारत जैसे तेल आयातक देशों को भी राहत मिल सकती है।
पेट्रोल डीजल की कीमतों पर दबाव कम होने के साथ-साथ आयात निर्यात की लागत में भी कमी आएगी। इसके अलावा अमेरिका और ईरान के बीच दशकों से चला आ रहा अविश्वास कम होने की संभावना भी बढ़ेगी। अगर आगे की वार्ताओं में परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे जटिल मुद्दों पर सहमति बनती है तो ईरान पर लगे कुछ आर्थिक प्रतिबंधों में ढील का रास्ता भी खुल सकता है। इससे ईरान की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और उसका तेल निर्यात बढ़ सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अभी केवल एक समझौता ज्ञापन है।
