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फतेहपुर(CNF)। राजनीति में पद तो आता-जाता रहता है, लेकिन पद के साथ जुड़ा मोह शायद ताउम्र पीछा नहीं छोड़ता। जिले के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक अजीबोगरीब भाषाई सर्कस देखने को मिल रहा है। जिले के कई माननीय, जिनमें पूर्व विधायक से लेकर पूर्व जिलाध्यक्ष तक शामिल हैं, अपने नाम के आगे पूर्व की जगह निवर्तमान लिखने में अपनी शान समझ रहे हैं।
हैरानी की बात यह है कि इनमें से कई ऐसे दिग्गज हैं जिन्हें पद छोड़े, हटाए गए या जनता द्वारा नकारे गए सालों बीत चुके हैं। बावजूद इसके, सोशल मीडिया की पोस्ट हो, शादी के कार्ड हों या फिर प्रेस नोट, हर जगह ये खुद को निवर्तमान ही लिख रहे हैं। नियमतः निवर्तमान शब्द का प्रयोग केवल उस व्यक्ति के लिए किया जाता है जिसका कार्यकाल अभी-अभी समाप्त हुआ हो और नया उत्तराधिकारी पदभार ग्रहण करने की प्रक्रिया में हो लेकिन हमारे जिले में तो गंगा ही उल्टी बह रही है। सालों पहले पूर्व हो चुके नेता भी खुद को निवर्तमान बताकर शायद यह संदेश देना चाहते हैं कि हमें इतिहास का हिस्सा न माना जाए, हम अभी भी रेस में हैं। जानकारों की मानें तो निवर्तमान शब्द के पीछे एक मनोवैज्ञानिक डर और बड़प्पन की झूठी ठसक छिपी है। पूर्व शब्द राजनीति में एक पूर्णविराम की तरह महसूस होता है, जबकि निवर्तमान में एक निरंतरता का भ्रम बना रहता है। विशेषकर सत्ताधारी दल में यह चलन ज्यादा है, जहाँ नेताजी अपनी पुरानी ठसक छोड़ने को तैयार नहीं दिखते। आम जनता के बीच अब यह चर्चा का विषय है कि जब नया अध्यक्ष या नया विधायक पूरी सक्रियता से मैदान में है, तो पुराने सूरमा निवर्तमान का चोला पहनकर किसे भ्रमित कर रहे हैं? आखिर जो आज निवर्तमान है, वह कल पूर्व तो होगा ही, फिर इस सत्य को स्वीकार करने में इतनी हिचक क्यों?

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