केंद्रीय कृषि और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को कश्मीर मामले को संभालने के तरीके और सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का विरोध करने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आलोचना की। चौहान ने सरदार वल्लभभाई पटेल की राष्ट्रीय एकता और मजबूत शासन की विरासत को याद किया। ‘ऑल इंडिया रेडियो’ पर 67वें ‘सरदार पटेल स्मारक व्याख्यान’ को डिजिटल माध्यम से संबोधित करते हुए चौहान ने कहा कि आजादी के बाद रियासतों को भारतीय संघ में शामिल करने के सरदार पटेल के प्रयासों के बिना, देश का मौजूदा भौगोलिक स्वरूप संभव नहीं हो पाता।

उन्होंने 1947-48 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान नेहरू द्वारा युद्धविराम (सीजफायर) की घोषणा करने के फैसले की आलोचना करते हुए कहा, ‘‘अगर कश्मीर का मामला भी सरदार वल्लभभाई पटेल पर छोड़ दिया गया होता, तो शायद जो हिस्सा पाकिस्तान के पास चला गया, वह नहीं जाता।’’ चौहान ने दावा किया कि जब युद्धविराम की घोषणा की गई, तब भारतीय सेना पाकिस्तानी बलों और कबायली लड़ाकों के खिलाफ आगे बढ़ रही थी। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा न हुआ होता, तो जम्मू-कश्मीर का पूरा क्षेत्र भारत का हिस्सा होता। उन्होंने यह भी दावा किया कि देश का प्रथम प्रधानमंत्री बनने के लिए पटेल को कांग्रेस के अधिकांश सदस्यों का समर्थन हासिल था, लेकिन महात्मा गांधी की इच्छा का सम्मान करते हुए उन्होंने नेहरू की नियुक्ति को स्वीकार कर लिया।

उन्होंने कहा, ‘‘इस तरह के त्याग का उदाहरण बहुत कम देखने को मिलता है।’’ उन्होंने पटेल को ऐसा नेता बताया, जिनके लिए व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से अधिक राष्ट्रीय एकता महत्वपूर्ण थी। मंत्री ने कहा कि पटेल ने बातचीत के जरिए कई रियासतों को भारत में शामिल होने के लिए राजी किया और जहां आवश्यक हुआ, वहां बल प्रयोग भी किया। उन्होंने कहा कि हैदराबाद, जूनागढ़ और भोपाल उन चुनौतियों के उदाहरण थे, जिनका सामना रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया के दौरान करना पड़ा।

उन्होंने पटेल को दूरदर्शी नेता बताते हुए कहा कि आधुनिक भारत के निर्माण में उनका योगदान महत्वपूर्ण था। चौहान ने पटेल की विरासत और नरेन्द्र मोदी सरकार की नीतियों के बीच समानता बताते हुए अनुच्छेद 370 को निरस्त करने, आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और नक्सलवाद को समाप्त करने के प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने इन्हें राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने की दिशा में उठाए गए कदम बताया।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति सरकार का दृष्टिकोण एक मजबूत देश और आतंकवाद के प्रति कतई बर्दाश्त नहीं करने की पटेल की सोच को दर्शाता है। सोमनाथ मंदिर के बारे में चौहान ने कहा कि आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू के विरोध के बावजूद मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प पटेल ने लिया था। उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल होने के कार्यक्रम पर नेहरू ने नाराजगी जताई थी।

मंत्री ने गुजरात में खेड़ा और बारदोली आंदोलनों में पटेल की भूमिका को याद करते हुए कहा कि उन्होंने फसल खराब होने और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद ब्रिटिश सरकार द्वारा लगान वसूलने के प्रयासों के खिलाफ किसानों को संगठित किया था। पटेल को भारत के एकीकरण का शिल्पकार बताते हुए चौहान ने गुजरात में ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ स्थापित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह स्मारक राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बन गया है।

उन्होंने कहा कि पटेल की 150वीं जयंती, ‘वंदे मातरम’ की रचना के 150 वर्ष और आदिवासी नेता बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती लोगों को राष्ट्रीय एकता और विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराने का अवसर प्रदान करती है। आकाशवाणी द्वारा 1955 से आयोजित की जा रही सरदार पटेल स्मारक व्याख्यान श्रृंखला भारत के पहले उपप्रधानमंत्री, गृह मंत्री और सूचना एवं प्रसारण मंत्री की विरासत का सम्मान करती है। यह व्याख्यान 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर रात साढ़े नौ बजे आकाशवाणी के राष्ट्रीय प्रसारण नेटवर्क पर देशभर में प्रसारित किया जाएगा।

राष्ट्रीय एकता दिवस सरदार पटेल की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है।

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