प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अच्छी मित्र और भारत के साथ मजबूत रिश्तों की पक्षधर इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को उत्तर प्रदेश का योगी मॉडल खूब भा रहा है। जिस तरह योगी सरकार दंगाइयों और उपद्रवियों से सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई कराने के लिए सख्त कदम उठाती है, उसी तर्ज पर मेलोनी सरकार ने भी हिंसक प्रदर्शनकारियों पर शिकंजा कसने का फैसला किया है। हम आपको बता दें कि इटली में अब तोड़फोड़ और लूटपाट करने वालों को जेल, भारी जुर्माने और नुकसान की भरपाई का सामना करना पड़ सकता है।

हम आपको बता दें कि इटली में हालिया हिंसा के बाद मेलोनी सरकार ने सुरक्षा संबंधी कड़े प्रावधानों को मंजूरी दी है। मिलान समेत उत्तरी इटली के शहरों में सप्ताहांत के दौरान प्रदर्शनकारियों के समूहों ने दुकानों के शीशे तोड़े, लूटपाट की और पुलिस पर हमले किए। इसके बाद सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि विरोध प्रदर्शन के नाम पर हिंसा करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। नए प्रावधानों के तहत सार्वजनिक सुरक्षा को खतरे में डालने वाली गतिविधियों में कम से कम पांच लोगों के समूह के साथ शामिल होने पर पांच साल तक की जेल और अधिकतम 20 हजार यूरो का जुर्माना लगाया जा सकता है। चेहरा छिपाकर हिंसा करने या दूसरे लोगों को घायल करने जैसी परिस्थितियों में सजा और कड़ी हो सकती है। अधिकारियों को उपद्रव के दौरान हुई क्षति की भरपाई कराने का अधिकार भी दिया गया है। यदि तोड़फोड़ या लूटपाट में नाबालिग शामिल पाए जाते हैं, तो उनके माता-पिता पर आर्थिक जिम्मेदारी डाली जा सकती है।

साथ ही मेलोनी सरकार ने 14 से 17 वर्ष के उन किशोरों को भी हिरासत में लेने की शक्ति पुलिस को दी है, जिनके खतरनाक होने के पर्याप्त संकेत हों, भले ही उन्होंने अभी कोई अपराध न किया हो। यह प्रावधान पहले वयस्कों तक सीमित था। इसके अलावा मिलान में महत्वपूर्ण स्थानों की सुरक्षा, संवेदनशील इलाकों की निगरानी और पुलिस की मदद के लिए 2026 के अंत तक 500 सैनिकों की तैनाती की घोषणा की गई है। देखा जाये तो मेलोनी का संदेश स्पष्ट है कि तोड़फोड़ और चोरी कोई क्रांति नहीं, अपराध हैं। सरकार का जोर इस बात पर है कि नाराजगी जताने का अधिकार कानून तोड़ने का लाइसेंस नहीं बन सकता।

क्या है योगी मॉडल की ताकत, यदि इस बारे में बात करें तो आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दंगाइयों और उपद्रवियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई को अपनी सरकार की नीति का अहम हिस्सा बनाया है। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों की पहचान से लेकर उनसे नुकसान की भरपाई कराने तक, सरकार ने साफ संदेश दिया कि कानून तोड़ने वालों को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसी सख्त नीति और प्रशासनिक कार्रवाई ने प्रदेश में कानून-व्यवस्था को मजबूत करने और दंगों पर पूरी तरह लगाम लगाने में अहम भूमिका निभाई है। देखा जाये तो योगी के इस मॉडल की सबसे बड़ी ताकत उसका निवारक संदेश है। जब उपद्रव करने वालों को गिरफ्तारी और आपराधिक मुकदमे के साथ आर्थिक जवाबदेही का भी जोखिम दिखाई देता है, तो सार्वजनिक संपत्ति को निशाना बनाने की कीमत बढ़ जाती है।

दूसरी ओर, इटली में हालात केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं। दक्षिणी हिस्सों में डीजल की बढ़ती कीमतों और महंगाई से नाराज ट्रक चालकों ने सड़कें जाम की हैं, जिससे आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई है। पास्ता बनाने वाली कुछ कंपनियों ने उत्पादन रोक दिया है, जबकि कृषि संगठनों ने फल और सब्जियां खराब होने की आशंका जताई है। सरकार ने ट्रांसपोर्ट कारोबार से जुड़े प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के बाद अतिरिक्त सहायता देने का भरोसा भी दिया है।

2022 में सत्ता संभालने के बाद से मेलोनी सरकार सुरक्षा संबंधी कई सख्त कदम उठा चुकी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, चार वर्षों में इटली की जेलों में कैदियों की संख्या 17 प्रतिशत से अधिक बढ़ी है। विपक्ष का आरोप है कि कठोर सजाएं अपराध और अव्यवस्था की मूल वजहों को दूर नहीं करतीं। लेकिन मेलोनी सरकार का तर्क है कि आर्थिक मुश्किलों को हिंसा का बहाना नहीं बनाया जा सकता। 2027 में होने वाले राष्ट्रीय चुनाव से पहले सरकार के सामने चुनौती है कि वह महंगाई से उपजे असंतोष को संभालने के साथ सड़कों पर कानून का राज भी कायम रखे।

उधर, यूरोप में बिगड़ते हालात की दूसरी तस्वीर फ्रांस से सामने आ रही है। वहां सितंबर में सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था में सुधार को लेकर शुरू हुए प्रदर्शन धीरे-धीरे महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी नाराजगी तक फैल गए। कई शहरों में प्रदर्शन हिंसक हो गए, दुकानों और सार्वजनिक इमारतों को नुकसान पहुंचा तथा आगजनी और लूटपाट की घटनाएं सामने आईं। अब तक 2,500 से अधिक लोगों को पुलिस हिरासत में लिया जा चुका है। साथ ही प्रशासन ने सप्ताहांत में प्रभावित क्षेत्रों में कर्फ्यू बढ़ाने और सुरक्षा कड़ी करने जैसे कदम उठाए हैं। पेरिस में कई इलाकों में प्रतिबंध लागू हैं। ल्योन, मार्सेई, लिली और लिमोज जैसे शहरों में भी अशांति और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचने की खबरें भी सामने आ रही हैं। विरोध प्रदर्शनों के कारण पर्यटन स्थलों और परिवहन सेवाओं पर भी असर पड़ा है।

बहरहाल, इटली और फ्रांस की घटनाएं यूरोप के सामने खड़ी एक बड़ी चुनौती को रेखांकित करती हैं। महंगाई और सरकारी नीतियों के खिलाफ विरोध के बीच जब भीड़ हिंसा, लूटपाट और आगजनी पर उतर आती है, तब सरकारों की प्राथमिक परीक्षा सार्वजनिक सुरक्षा और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की होती है। योगी आदित्यनाथ की नीति से तुलना का आधार भी यही है कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों की पहचान हो, उनके खिलाफ मुकदमे चलें और कानूनी प्रक्रिया के तहत क्षतिपूर्ति की जिम्मेदारी तय हो। उत्तर प्रदेश में 2020 का कानून इसके लिए दावा अधिकरणों की व्यवस्था भी करता है। अब यूरोप में मेलोनी की सख्ती और फ्रांस में सुरक्षा उपायों के बीच निगाह इस बात पर रहेगी कि सरकारें उपद्रव पर कितनी प्रभावी रोक लगा पाती हैं और दोषियों को कानून के दायरे में लाने में कितनी सफल होती हैं।

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