एक ओर पाकिस्तान की कूटनीति धराशायी हो चुकी है तो दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति वैश्विक मंच पर ऐसे गूंज रही है कि दुनिया उसे नजरअंदाज नहीं कर पा रही। हालिया घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि अब वैश्विक शक्ति संतुलन का नया केंद्र भारत बन चुका है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के बीच हुई ताजा बातचीत बदलती विश्व व्यवस्था का स्पष्ट संकेत है।
करीब चालीस मिनट चली इस बातचीत में जिस तरह द्विपक्षीय संबंधों में प्रगति पर चर्चा हुई, वह इस बात का प्रमाण है कि भारत अब केवल साझेदार नहीं, बल्कि रणनीतिक धुरी बन चुका है। यह वही भारत है जिसे कभी क्षेत्रीय शक्ति तक सीमित समझा जाता था, लेकिन आज वही भारत वैश्विक फैसलों के केंद्र में बैठा है।
इस बातचीत का सबसे अहम पहलू पश्चिम एशिया की स्थिति पर गहन विचार विमर्श रहा। होरमुज जलडमरूमध्य को खुला और सुरक्षित रखने पर जोर देना वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा को बचाने का स्पष्ट संदेश है। यह वही मार्ग है जहां से दुनिया की बड़ी ऊर्जा जरूरतें गुजरती हैं। ऐसे में भारत की सक्रिय भागीदारी यह दिखाती है कि अब वह केवल अपने हितों तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता का जिम्मेदार प्रहरी बन चुका है।
रणनीतिक दृष्टि से देखें तो यह घटनाक्रम कई स्तरों पर भारत के लिए निर्णायक है। अमेरिका के साथ संभावित बड़े समझौते इस दिशा में एक ठोस कदम हैं। यह केवल तेल या गैस की खरीद नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक सुरक्षा का ढांचा है। जब कोई देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित कर लेता है, तो वह आर्थिक और सामरिक दोनों मोर्चों पर मजबूत हो जाता है। एक और महत्वपूर्ण पहलू आपूर्ति श्रृंखला और तकनीकी सहयोग है। अमेरिका के साथ बढ़ती साझेदारी का मतलब है कि भारत अब वैश्विक उत्पादन और तकनीकी ढांचे में केंद्रीय भूमिका निभाएगा। यह वह क्षेत्र है जहां भविष्य की ताकत तय होती है।
