– 1994 में शुरू हुए दीवानी वाद में बहाली अर्जी पर विपक्ष ने जताई आपत्ति
– विलंब माफी का आवेदन न होने समेत कई बिंदुओं पर उठाए सवाल

CITY NEWS FATEHPUR

फतेहपुर(CNF)। करीब 31 वर्ष पहले शुरू हुआ प्रेम सिंह बनाम राजेन्द्र सिंह आदि का दीवानी विवाद अब एक बार फिर बहाली प्रार्थना पत्र को लेकर चर्चा में है। सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की अदालत में विचाराधीन वाद संख्या 36/1994 में विपक्षी राजेन्द्र सिंह की ओर से बहाली की मांग पर आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे निरस्त किए जाने की मांग की गई है।

अभिलेखों के मुताबिक प्रेम सिंह ने वर्ष 1994 में मूल दीवानी वाद दाखिल किया था। 11 अक्तूबर 1994 को प्रारंभिक न्यायिक कार्रवाई हुई और 12 अक्तूबर 1995 को अदालत ने आदेश पारित किया। इसके बाद उक्त आदेश के खिलाफ सिविल अपील संख्या 26/2009 दाखिल की गई। अपील की कार्यवाही के दौरान प्रेम सिंह की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनके स्थान पर संबंधित पक्षकारों के नाम दर्ज किए गए।

दस्तावेजों में उल्लेख है कि 28 मार्च 2012 को अपील स्वीकार हुई। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रथम अपील संख्या 2843/2012 दाखिल की गई। हाईकोर्ट ने 4 अप्रैल 2024 को उक्त प्रथम अपील निरस्त कर दी।

इधर, मूल दीवानी वाद में 6 अप्रैल 2023 के आदेश को लेकर विवाद खड़ा हुआ। अभिलेखों के अनुसार उक्त तारीख को पक्षकारों की अनुपस्थिति में वाद खारिज कर दिया गया था। हालांकि वादी पक्ष का कहना है कि उसे इस आदेश की जानकारी तत्काल नहीं हो सकी। 24 अप्रैल 2024 को पत्रावली का निरीक्षण करने के बाद 6 अप्रैल 2023 के आदेश की जानकारी मिलने का दावा किया गया। इसके बाद वाद को दोबारा बहाल किए जाने के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया गया।

इस बहाली प्रार्थना पत्र पर राजेन्द्र सिंह की ओर से 23 जुलाई 2026 को शपथ पत्र के माध्यम से आपत्ति दाखिल की गई। विपक्षी ने बहाली प्रार्थना पत्र को अवैधानिक, अनावश्यक और अमान्य बताते हुए खारिज करने की मांग की है। आपत्ति में प्रमुख रूप से यह सवाल उठाया गया है कि बहाली प्रार्थना पत्र के साथ विलंब माफी का कोई आवेदन प्रस्तुत नहीं किया गया है। साथ ही कथित विलंब के लिए पर्याप्त आधार भी नहीं बताया गया है।

विपक्षी पक्ष ने बहाली अर्जी में दर्ज विभिन्न तथ्यों पर भी आपत्ति जताई है। उसका कहना है कि पत्रावली के निरीक्षण से यह स्पष्ट है कि मूल वाद 6 अप्रैल 2023 को पक्षकारों की अनुपस्थिति में खारिज हो चुका था। आरोप लगाया गया है कि बहाली की मांग करते समय आवश्यक तथ्यों को सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया गया।

अब करीब तीन दशक पुराने इस मुकदमे में बहाली प्रार्थना पत्र पर अदालत के निर्णय पर सबकी निगाहें टिकी हैं। दोनों पक्षों की दलीलों और न्यायिक अभिलेखों के परीक्षण के बाद ही अदालत यह तय करेगी कि वाद को बहाल किए जाने का आधार बनता है या विपक्ष की आपत्ति स्वीकार करते हुए प्रार्थना पत्र खारिज किया जाता है।

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