9 अप्रैल 2026 को परर्शियन गल्फ के ऊपर उड़ रहा अमेरिकी एमक्यू4 सी ट्राइटन ड्रोन अचानक रडार से गायब हो गया था। कुछ ही समय बाद अमेरिकी नौसेना ने इसे क्रैश घोषित कर दिया। आधिकारिक बयान साफ था कि यह तकनीकी हादसा है। कोई हमला नहीं। लेकिन मिडिल ईस्ट के मौजूदा हालात और पुराने घटनाक्रमों को देखते हुए यह सवाल फिर उठने लगा है कि क्या अमेरिका हर बार सच को क्रैश के पीछे छिपा देता है। यह पहली बार नहीं है जब किसी अमेरिकी सैन्य उपकरण के नुकसान को लेकर दो अलग-अलग नैरेटिव सामने आए हो। इतिहास में कई बार ऐसे दावे किए गए हैं कि ईरान ने अमेरिकी ड्रोन या सैन्य विमानों को निशाना बनाया। जबकि अमेरिका ने उन्हें तकनीकी खराबी दुर्घटना बताया। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अक्सर नहीं हो पाती है लेकिन संदेह की यह परत हर नई घटना के साथ और मोटी होती जाती है।
एम4 सी ट्राइटन कोई साधारण ड्रोन नहीं था। यह हाईटेक निगरानी सिस्टम 500 फीट की ऊंचाई से विशाल समुद्री क्षेत्र पर नजर रख सकता है और रियल टाइम खुफिया जानकारी भेजता है। ऐसे संवेदनशील और अत्याधुनिक प्लेटफार्म का अचानक क्रैश होना कई सवाल भी खड़े करता है। क्या यह सिर्फ तकनीकी खराबी थी या फिर किसी इलेक्ट्रॉनिक जॉमिंग, साइबर इंटरफेरेंस या फिर बाहरी हमले का नतीजा। घटना के तुरंत बाद कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि ईरान ने इस ड्रोन को मार गिराया हो सकता है। खासकर स्टेट ऑफ हुरमुज जैसे संवेदनशील इलाके में जहां दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर रहता है। लेकिन अमेरिका ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया था। यहां पर संदेह और गहरा हो जाता है। आलोचकों का कहना है कि अगर वास्तव में किसी बाहरी हमले की पुष्टि होती है तो उसे सार्वजनिक करना रणनीतिक रूप से अमेरिका के लिए नुकसानदेह हो सकता है। इससे ना सिर्फ उसकी सैन्य तकनीक की कमजोरियां उजागर होंगी बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर भी असर सीधा-सीधा पड़ेगा। इसलिए क्रैश जैसे शब्द कई बार एक सुविधाजनक आधिकारिक व्याख्या बन जाते हैं। इस दौरान MQ9 रिपर ड्रोन के कथित नुकसान की खबरों ने इस बहस को और ज्यादा हवा दी है। अगर इतने बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है तो यह सिर्फ सहयोग या तकनीकी विफलता कहना मुश्किल लगता है। हालांकि इन आंकड़ों पर भी स्पष्ट आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि मिडिल ईस्ट अब पारंपरिक युद्ध से आगे बढ़कर ग्रेस ज़ोन वॉरफेयर का मैदान बन चुका है। जहां सीधी लड़ाई कम और परोक्ष हमले, साइबर युद्ध और इलेक्ट्रॉनिक इंटरफेरेंस ज्यादा होते हैं। ऐसे माहौल में सच्चाई और आधिकारिक बयान के बीच अंतर होना असामान्य नहीं माना जाता। फिलहाल एमक्यू4 ट्राई टर्न हादसे की जांच जारी है।
पाकिस्तान के यह कहने के बाद कि लेबनान को इसमें शामिल किया गया है। उन्होंने कहा कि इसराइल ने लेबनान भर में महज 10 मिनट के भीतर 100 हमले किए जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए हैं। जी हां, इसराइल ने साउथ लेबनान पर 10 मिनट में ही 100 हमले अंजाम दिए और सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया। एक्सपर्ट कहते हैं कि यह ईरान के लिए उकसाने वाली कारवाई हो सकती है और ईरान ने इस पर तुरंत प्रतिक्रिया भी दी। उसने समंदर में फिर से पहरा लगा दिया है। ईरान ने स्ट्रेट ऑफ हरमोस को बंद कर दिया है। जिससे कच्चे तेल की कीमतों में फिर उछाल आ गया। यानी सीज फायर पर संकट आ गया है। 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में शर्तों पर बात करने के लिए बैठक होनी है और उससे पहले ही इसराइल ने घमासान शुरू करवा दिया। एक्सपर्ट कहते हैं कि दरअसल इसराइल को इस बात की टीस भी थी कि उसे भरोसे में लिए बगैर ट्रंप ने ईरान के साथ सीज फायर का ऐलान कर दिया। जबकि उससे पहले ईरान पर भयानक हमले की डेडलाइन दी थी। इजराइल जानता है कि बड़ी मुश्किल से जंग में लाए गए अमेरिका को बिना किसी निर्णायक स्थिति के जाने देना मतलब अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। क्योंकि ईरान में आयतुल्लाह खामई की हत्या के बावजूद ना तो इसराइल अमेरिका वहां इस्लामिक रेवोल्यूशन को खत्म कर पाए और ना ही खामिनी सुप्रीमेसी को सब कुछ वैसा का वैसा ही है। बल्कि और आक्रामक हो गया है इसराइल के खिलाफ। ऐसे में अमेरिका का ऐसे ही पीछा छुड़ाकर चले जाना इसराइल के लिए बहुत घातक होगा और ईरान और उसके प्रॉक्सी इसराइल को छोड़ेंगे नहीं। इसलिए भी वह पूरी ताकत लगा रहा है कि जंग चलती रहे और पीएम नितिन याू को भी अपने देश की जनता को जवाब देने की वजह मिल जाए। वरना सवाल उनसे भी होगा कि ईरान पर हमला करके और इसराइल में इतना नुकसान करवाकर इसराइल को हासिल क्या हुआ?
