रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन एक बार फिर भारत आने की तैयारी में के हवाले से यह खबर आई है कि पुतिन इस साल के अंत में भारत में होने वाले ब्रिज शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि पुतिन अभी हाल ही में यानी दिसंबर 2025 में भारत आए थे। तब उन्होंने पीएम मोदी के साथ मिलकर दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूत करने पर लंबी बातचीत की थी। इस दौरान दोनों देशों के बीच कई बड़े समझौते हुए और अब अगर वह सितंबर 2026 में फिर से दिल्ली आते तो 1 साल के भीतर उनकी दूसरी भारत यात्रा होगी। दरअसल सितंबर 2026 में नई दिल्ली में ब्रिक्स का 18वां शिखर सम्मेलन होने जा रहा है। जिसकी मेजबानी भारत कर रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब दुनिया कई तरह की चुनौतियों से गुजर रही है। चाहे वह आर्थिक चुनौतियां हो, ऊर्जा संकट हो या फिर वैश्विक राजनीति में बदलाव और ऐसे में पुतिन का भारत आना वह भी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में इसकी अहमियत को और बढ़ाने का काम कर रहा है। इससे पहले जब पुतिन 2025 में भारत आए थे। उस दौरान भारत रूस वार्षिक सम्मेलन हुआ था। जिसमें दोनों देशों ने रक्षा ऊर्जा, व्यापार और टेक्नोलॉजी जैसे कई अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया था। उस यात्रा ने दोनों देशों के रिश्तों को नई मजबूती दी थी। दरअसल भारत और रूस के संबंध कई दशकों पुराने हैं। दोनों देशों के बीच साल 2000 में रणनीतिक साझेदारी की शुरुआत हुई थी और तब से यह रिश्ता लगातार मजबूत होता गया।

रक्षा क्षेत्र में रूस भारत का एक बड़ा सहयोगी रहा। इसके अलावा ऊर्जा, अंतरिक्ष और परमाणु क्षेत्र में भी दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं। अगर ब्रिक्स की बात करें तो यह अब सिर्फ पांच देशों का समूह नहीं रहा। इसमें अब 11 देश शामिल हो चुके हैं। जिनमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका के अलावा मिस्र, ईरान, सऊदी अरब, यूएई, इथियोपिया और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हैं। यह मंच विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने का काम करता है और वैश्विक मुद्दों पर एक साझा रणनीति बनाने में मदद भी करता है। भारत ने 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली है और इस बार उसका फोकस ह्यूमैनिटी फर्स्ट यानी मानवता को प्राथमिकता देने पर है। भारत की कोशिश है कि इस मंच के जरिए ग्लोबल साउथ के देशों को ज्यादा ताकत मिले और नई तकनीकों का लाभ भी मिल सके। और यहां आपको एक और बड़ी बात बता दें। अमेरिका इसी ब्रिक्स को अपने लिए खतरे के तौर पर देखता है।

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