— मौलिक कविता
मोहम्मद सोहैल
सिटी न्यूज़ फतेहपुर
जब रात घनी हो जाती है,
जब राहें खो जाती हैं,
जब अपने भी इस दुनिया में
अनजाने हो जाते हैं।
तब मन के सूने आंगन में,
विश्वास का दीप जलाएं,
नफरत की दीवारें तोड़ें,
प्रेम के फूल खिलाएं।
माना कि मुश्किल दौर है,
माना कि दर्द हजार,
फिर भी हिम्मत हार न मानें,
खुलेंगे खुशियों के द्वार।
जो भूखा है, उसे रोटी दें,
जो प्यासा है, जल दें,
जो गिरकर फिर उठ न सके,
उसको थोड़ा संबल दें।
मजहब की दीवारों से ऊंचा,
इंसानियत का मान रहे,
हर चेहरे पर मुस्कान खिले,
हर दिल में हिंदुस्तान रहे।
कल की चिंता छोड़कर हम,
आज को बेहतर बनाएं,
अपने छोटे-छोटे कर्मों से,
एक नया समाज बनाएं।
इतिहास वही लिख पाता है,
जो तूफानों से लड़ता है,
पत्थर पर भी फूल खिलाता,
जो उम्मीदों से जुड़ता है।
आओ मिलकर कसम ये खाएं,
न कोई बेबस, लाचार रहे,
जब तक सांसें बाकी हैं,
इंसानियत का सत्कार रहे।
अंधियारों से डरना कैसा,
जब मन में उजियारा है,
उम्मीदों के इस संसार में,
हर सवेरा हमारा है।
