धर्मेंद्र सिंह “राजू”
CITY NEWS FATEHPUR
लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी जरूर होते हैं, लेकिन दोनों का अंतिम दायित्व जनता के प्रति होता है। आज की भारतीय राजनीति में राजनीतिक बहस तेज है, मुद्दे अनेक हैं और आरोप-प्रत्यारोप भी लगातार सामने आते हैं। ऐसे समय में जरूरी है कि राजनीति को केवल सत्ता पक्ष और विपक्ष की लड़ाई के रूप में न देखा जाए, बल्कि यह समझने की कोशिश की जाए कि इस संघर्ष के बीच आम नागरिक के सवालों को कितनी प्राथमिकता मिल रही है।
सत्ता पक्ष के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी शासन के परिणामों को जमीन पर पहुंचाने की है। सरकार विकास, बुनियादी ढांचे, डिजिटल सेवाओं, कल्याणकारी योजनाओं और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने की अपनी कोशिशों को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती है। इन प्रयासों का मूल्यांकन केवल राजनीतिक दावों से नहीं, बल्कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, किसानों की आय और आम नागरिक की जीवन-स्थितियों पर पड़ने वाले वास्तविक प्रभाव से होना चाहिए।
दूसरी ओर, विपक्ष लोकतंत्र में निगरानी और सवाल पूछने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सरकार की नीतियों पर प्रश्न उठाना, कमियों को सामने लाना और वैकल्पिक नीतियां प्रस्तुत करना विपक्ष का स्वाभाविक दायित्व है। लेकिन विपक्ष की प्रभावशीलता केवल सरकार का विरोध करने से नहीं, बल्कि यह बताने से भी तय होती है कि वह उन्हीं समस्याओं के समाधान के लिए क्या अलग रास्ता अपनाएगा।
यही बात सत्ता पक्ष पर भी लागू होती है। हर आलोचना को राजनीतिक विरोध मानकर खारिज करना लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर कर सकता है। सरकार को अपनी नीतियों का पक्ष रखने के साथ-साथ असहमति के सवालों का तथ्यपूर्ण जवाब देने की क्षमता भी दिखानी चाहिए। संसद में बहस जितनी गंभीर होगी, कानून निर्माण की प्रक्रिया उतनी ही मजबूत होगी।
आज संसद और विधानसभाओं में राजनीतिक टकराव कोई नई बात नहीं है। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं। समस्या तब पैदा होती है जब मतभेद संवाद की जगह गतिरोध का रूप ले लेते हैं। सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है कि वह विपक्ष को पर्याप्त अवसर दे, जबकि विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह संसदीय कार्यवाही को बाधित करने के बजाय उपलब्ध लोकतांत्रिक मंचों का अधिकतम उपयोग करे।
देश के सामने इस समय कई ऐसे प्रश्न हैं जिन पर राजनीतिक दलों के बीच गंभीर बहस आवश्यक है—रोजगार के अवसर, युवाओं की आकांक्षाएं, किसानों की आय, शिक्षा की गुणवत्ता, स्वास्थ्य सुविधाएं, महंगाई, छोटे कारोबार की चुनौतियां और सामाजिक सौहार्द। इन मुद्दों पर सरकार को अपने फैसलों और परिणामों का हिसाब देना चाहिए, वहीं विपक्ष को आलोचना के साथ ठोस और व्यावहारिक विकल्प भी जनता के सामने रखने चाहिए।
राजनीति का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक विश्वास है। चुनावी राजनीति में आरोप और प्रत्युत्तर स्वाभाविक हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा और तथ्य की विश्वसनीयता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। राजनीतिक दलों के समर्थकों के बीच मतभेद हो सकते हैं, मगर लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी मजबूत रहती है जब राजनीतिक असहमति को व्यक्तिगत दुश्मनी में बदलने से रोका जाए।
सरकार की हर नीति गलत नहीं हो सकती और विपक्ष की हर आलोचना भी सही या गलत मान लेने का कोई लोकतांत्रिक आधार नहीं है। किसी नीति का मूल्यांकन उसके उद्देश्य, उसके क्रियान्वयन और उसके परिणामों के आधार पर होना चाहिए। इसी तरह विपक्ष की भूमिका का आकलन भी केवल उसके विरोध से नहीं, बल्कि उसके द्वारा उठाए गए सवालों और प्रस्तुत किए गए विकल्पों की गुणवत्ता से होना चाहिए।
आज जनता राजनीतिक दलों से केवल भाषण नहीं, परिणाम चाहती है। युवा अवसर चाहते हैं, किसान अपनी मेहनत का उचित प्रतिफल चाहते हैं, मध्यम वर्ग आर्थिक सुरक्षा चाहता है और गरीब बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सम्मानजनक जीवन चाहता है। इन अपेक्षाओं का समाधान सत्ता और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है।
इसलिए आज की राजनीति का सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि कौन किस पर भारी पड़ रहा है। असली सवाल यह है कि किसी भी राजनीतिक संघर्ष के बीच जनता की आवाज कितनी मजबूती से सुनी जा रही है।
सत्ता को जवाबदेह रखना विपक्ष का धर्म है और शासन को प्रभावी बनाना सत्ता की जिम्मेदारी। दोनों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र को मजबूत कर सकती है, बशर्ते राजनीतिक संघर्ष का केंद्र व्यक्ति नहीं, नीति हो; आरोप नहीं, तथ्य हों; और सत्ता की राजनीति से ऊपर जनता का हित हो।
आखिर लोकतंत्र में अंतिम निर्णायक जनता ही है। राजनीतिक दल आते-जाते हैं, सरकारें बदलती हैं, लेकिन जनता के सवाल बने रहते हैं। इसलिए आज की राजनीति के लिए सबसे जरूरी
संदेश यही है—
बहस हो, तीखी हो, लेकिन तथ्य के साथ; विरोध हो, मजबूत हो, लेकिन विकल्प के साथ; और सत्ता हो, तो जवाबदेही के साथ।
